अंतरिक्ष में चीन को चांद चाहिए तो भारत भी ब्रह्मांड का बॉस बनने की राह पर

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अब जमीन के टुकड़े की जंग की बात छोड़िए क्योंकि चांद के टुकड़े को लेकर दावेदारी की जमीन तैयार हो रही है. चीन ने चांद के अनदेखे हिस्से में अपना स्पेसक्रॉफ्ट उतार कर कहा है कि, ‘उसे चांद चाहिए’. चीन ने चंद्रमा के पिछले यानी धरती से नजर नहीं आने वाले हिस्से पर अपना स्पेसक्राफ्ट चांगी-4 उतार दिया. चांद के इस अनदेखे और अबूझ हिस्से पर दुनिया के किसी यान ने पहली बार लैंडिंग की है. हालांकि, अमेरिका और रूस चांद पर दस्तक दे चुके हैं. लेकिन अंतरिक्ष में कामयाबी की दौड़ की होड़ में चीन ने बड़ी तेजी से अपना वर्चस्व बनाने का काम किया है.

एशिया में सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि भारत भी अंतरिक्ष में अपनी प्रौद्योगिकी से दुनिया को लोहा मनवा चुका है. साल 2008 में चंद्रयान-1 की कामयाबी के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी यानी इसरो चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग की तैयारी में है. 31 जनवरी तक इसरो चंद्रयान-2 लांच कर सकता है. चंद्रयान-1 ने चांद की परिक्रमा कर चांद की सतह पर पानी होने का सबूत दिया था.

इसरो की सिर्फ चांद पर दस्तक देने की ही योजना नहीं है बल्कि वो अंतरिक्ष में मानव मिशन के लिए कमर कस चुका है. देश के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के जरिए तीन अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष यान में बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाएंगे. लेकिन मिनश गगनयान के पहले दो बार मानवरहित प्रयोग भी किया जाएगा ताकि किसी भी खामी को दुरुस्त किया जा सके.

अगर सब कुछ रणनीति और योजनाओं के मुताबिक ठीक रहा तो साल 2022 तक अंतरिक्ष में भारत का पहला मानव मिशन जा चुका होगा. ऐसा करने वाला भारत दुनिया में रूस, अमेरिका और चीन के बाद चौथा देश बन जाएगा जिसने अंतरिक्ष में इंसान भेजा. इससे पहले भारतीय वायुसेना के स्क्वॉड्रन लीडर राकेश शर्मा भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री थे जो कि रूस के मिशन का हिस्सा थे.

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से पीएम मोदी ने एलान किया था कि चार साल के भीतर भारत अंतरिक्ष में अपना मानव मिशन भेजेगा. इसरो के स्वर्णिम सफर में ये अध्याय स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि एक वो दिन भी था जब भारत ने अपना पहला रॉकेट छोड़ने से पहले उसके कुछ हिस्सों को साइकिलों और बैलगाड़ियों पर लाद कर लॉन्च पैड तक पहुंचाया था. लेकिन इसके बाद भारत ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

आज भारत के पास अंतरिक्ष में कामयाबी की मिसाल के तौर पर मंगल यान  है तो उसके खाते में कुल 104 सैटेलाइट प्रक्षेपित करने का विश्व रिकॉर्ड भी है. एशिया में सिर्फ भारत ही अकेला देश है जिसका मंगल मिशन कामयाब रहा है.

साल 1963 में पहला रॉकेट लॉन्च करने के 12 साल बाद साल 1975 में भारत ने पहला उपग्रह आर्यभट्ट प्रक्षेपित किया तो साल 1980 में पहले स्वदेशी सैटेलाइट वीइकल SLV-3 के जरिए रोहिणी सैटलाइट को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया. लेकिन अंतरिक्ष की दौड़ में चीन का कार्यक्रम भारत से कई दशक आगे जा चुका है. चीन इस दशक के भीतर अब चांद पर अपने यात्रियों को उतारना चाहता है. चीन मंगल ग्रह से भी कुछ अलग ही खोज में जुटा हुआ है. मंगल ग्रह की जमीन से चीन की मिट्टी लाने की योजना है.

( प्रतीकात्मक )

चीन के लैंडर-रोवर ने जब चांद की सतह को छुआ तो सैकड़ों चीनी वैज्ञानिकों की मेहनत को कामयाबी का फल मिला तो साथ ही अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की ख्वाहिश को परवाज भी मिला. लैंडर-रोवर ने उतरते ही तस्वीर भेज कर चीन पर खुद के होने का सबूत भी भेज डाला. ऐसे में अंतरिक्ष में वर्चस्व की होड़ में भारत भले ही चीन से पीछे है लेकिन अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के हिस्से में वो रिकॉर्ड हैं जिन्हें चीन छू नहीं सका है.

देश भारतीय अंतरिक्ष कार्यकमों के जनक और इसरो के पहले चेयरमैन डॉक्टर विक्रम साराभाई की जन्मशताब्दी मनाने जा रहा है. ऐसे में चंद्रयान-2 की कामयाबी और मिशन गगनयान उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगा जिन्होंने आजादी के बाद भारत के विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को समझा और अंतरिक्ष अनुसंधान के द्वार खोले.



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