पापा की शहादत पर राजनीति करने वालों से कुछ नहीं कहूंगी, वे नहीं समझेंगे : जुई करकरे

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मुंबई.भोपाल से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर ने मुंबई में 26/11 को हुए हमले में शहीद हुए महाराष्ट्र एटीएस चीफ हेमंत करकरे पर आपत्तिजनक बयान दिया था। इस पर हेमंत करकरे की बेटी जुई करकरे ने पहली बार बात की है। उन्होंने कहा, “पिता की शहादत के 11 साल बाद कुछ नेता चुनावी फायदे के लिए आपत्तिजनक बयान दे रहे हैं। ऐसे नेताओं से मुझे कुछ नहीं कहना, क्योंकि वो समझेंगे भी नहीं और मैं ऐसे लोगों पर बोलकर उन्हें अहमियत भी नहीं देना चाहती। वोटर समझदार हैं, वे ही जवाब देंगे।”बातचीत के दौरान जुई की आवाज कभी भारी तो कभी गुस्से से तेज होती रही। विशेष संवाददाता मनीषा भल्ला ने अमेरिका के बॉस्टन में रह रहीं जुई से फोन पर बात की। बातचीत के संपादित अंश…

भास्कर: प्रज्ञा ठाकुर ने आपके पिता हेमंत करकरे को लेकरकुछ कहा है, क्या आपने उनका वह बयान सुना है?
जुई:मैंने जब बयान सुना तो मां की लिखी कविता की लाइनें गूंजने लगीं। मां बोला करती थीं- “मेरे पति के शहीद होने का मुझे ग़म ज़रूर है, अफसोस नहीं… फिर भी कुछ सवाल दिल में आते हैं, पर जवाब मिल नहीं पाते। फिर मन कहता है, पागल तू किस से सवाल करता है? मालेगांव बम ब्लास्ट की मेरे पति ने जांच पूरी की है… करकरे, कामटे और सालसकर शहीद हुए, अब तो भारत माता की राजनीति है।”मां कहती थीं कि हेमंत की शहादत पर कुछ लोगों ने तो ये भी कहा कि इनके पति को हीरोगिरी का शौक था, इसलिए ऐसा हुआ। पर मेरा कहना है कि यही उनकी देशभक्ति की अमर निशानी है। आखिर वह (प्रज्ञा) किसके लिए ऐसा बोल रही हैं? अपने लोगों के लिए, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी है।

भास्कर:लेकिन इस शहादत पर तो राजनीति हो रही है…
जुई:ऐसे नेताओं से कुछ नहीं कहना। फायदा भी नहीं है। पर वोटर समझदार हैं। जानते हैं कि कौन शहीदों की इज्जत कर रहा और कौन नीचा दिखा रहा है। शहीद को नीचा दिखाने वाले लोगों की कोई भी चाल काम नहीं आएगी।

भास्कर: प्रज्ञा ठाकुर कह रही हैं कि आपके पापा हेमंत करकरे की मृत्यु उनके श्राप से हुई है…

जुई:मैं पापा की शहादत पर ओछी राजनीति करने वालों से कुछ नहीं कहूंगी, वो समझेंगे भी नहीं।

भास्कर:पापा और मां के जाने के बाद जिंदगी को कैसे बढ़ा रही हैं?
जुई:मैं बॉस्टन में पति और दो बेटियों ईशा (8 साल) और रूतुजा (5 साल) के साथ रहती हूं। मैं यहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं और पति बैंकिंग सेक्टर में हैं।

भास्कर: आपकी छोटी बहन शायली और भाई आकाश?
जुई:उनके बारे में बात नहीं करूंगी। पिता और मां के निधन के बाद दोनों ने खुद को लोगों से दूर कर लिया है। किसी से नहीं मिलते। उनकी प्राइवेसी पर बात नहीं करूंगी।

भास्कर:26/11 वाले दिन आप पापा के साथ मुंबई में थीं या यूएस?
जुई:11 साल पुरानी बात है। मेरी ननद हमारे पास बॉस्टन आई हुईं थीं। हम घूम रहे थे। शादी के बाद दिसंबर में मैं और पति पहली दफा भारत जाने वाले थे। वहां गेट-टू-गेदर ऑर्गेनाइज किया था। सब एक्साइटेड थे। 26 नवंबर को बहन का फोन आया कि पापा टीवी पर नजर आ रहे हैं। वह हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रहे हैं। भागकर घर पहुंची और टीवी ऑन किया। मैं, मां, भाई और पति कॉन्फ्रंसिंग पर थे। तभी खबर फ्लैश हुई कि हेमंत करकरे ज़ख्मी हो गए हैं। हमें लगा कि छोटीमोटी चोट लगी होगी। कुछ देर में खबर आई कि करकरे शहीद हो गए। हमने जो गेट-टू-गेदर जश्न के लिए प्लान किया था, वह मातम में बदल गया।

भास्कर:पापा की शहादत पर आज भी कई सवाल भी उठते रहते हैं?
जुई:शहीद अशोक कामटे की पत्नी विनिता कामटे और मेरे पास पापा और कामटे साहब की लास्ट कॉल डिटेल्स हैं। पापा ने कंट्रोल रूम में बोला कि हमें आर्मी चाहिए ताकि कामा अस्पताल घेरा जा सके। कंट्रोल रूम में एडिशनल सीपी को होना चाहिए था, लेकिन वे वहां नहीं थे। तीनों ऑफिसर (हेमंत करकरे, अशोक कामटे, विजय सालसकर) योजना को अंजाम देने में माहिर थे। फिर भी यह सब हो गया…। आज तक इस सवाल से उबर नहीं पाई हूं।

भास्कर:करकरे जी की कोई बात जो आज भी दिल के करीब है?
जुई:उनके संस्कार। पापा जब छोटे थे तो बाहर खेलने गए। वहां गाली सुनी और वही गाली घर में भी कह दी। दादी ने बोला कि जाओ इसी वक्त पानी से कुल्ला करो और अपना मुंह साफ करो। उसके बाद दादी ने उन्हें संस्क़ृत श्लोक सिखाने शुरू किए और रामरचा सिखाया।

भास्कर:बड़ी बेटी होने के नाते पापा के जाने पर आप पर जिम्मेदारी आई। कैसे संभाला?
जुई:गुस्सा आता था। फ्रस्ट्रेशन होता था। निगेटिविटी हावी होने से पहले खुद को संभाला। मां ने ताकत दी। ध्यान बटाने के लिए वो पढ़ाती, स्वीमिंग और योगा करती थीं। लगा सब ठीक हो जाएगा। लेकिन तभी ब्रेन हेमरेज से उनकी मौत हाे गई। उनके अंग दान किए। जाते-जाते वो 3 जिंदगियां बचा गईं। दोनों का जाना हम भाई-बहनों के लिए सबसे बड़ा नुकसान साबित हुआ।

भास्कर:पता चला आपके पापा ने मम्मी का नाम बदलकर कविता रख दिया था?
जुई:हां, पापा को कविता का शौक था। इसलिए मां को ज्योत्सना की जगह कविता नाम से पुकारने लगे थे। एक बात और बताना चाहूंगी। 11 साल की उम्र में दीवाली पर मैं पटाखे लाई। पापा बोले कि दीवाली अनाथालय में मनाएंगे। क्योंकि उन बच्चों के लिए पटाखे कौन लाएगा, उन्हें कौन देगा। फिर मैं पटाखे अनाथालय ले गई।

भास्कर:बतौर पुलिस ऑफिसर पापा की कौन सी बात प्रभावित करती थी?
जुई:उनकी संवेदनशीलता। चंद्रपुर में एसपी थे तो गांव के लोगों को नक्सलियों से नहीं डरने के लिए बोलते थे। पर कभी नक्सलियों पर गोली नहीं चलाई। क्योंकि वह जानते थे कि नक्सली एक विचारधारा है जिसे गोली से खत्म नहीं किया जा सकता। वह गांव वालों को बताते थे कि वे पुलिस का साथ दें, नक्सलियों को पनाह नहीं दें।

भास्कर:मौजूदा राजनीतिक माहौल में बेहतर विकल्प देने के लिए इस क्षेत्र में आएंगी?
जुई:फिलहाल तो नहीं। अभी बेटियों को बड़ा कर लूं। अभी मुझ पर परिवार की जिम्मेदारी है। हम लोगों ने बहुत नॉर्मल जिंदगी जी है। कोई खास पैसे नहीं होते थे हमारे पास। बस मैं अपने पापा की तरह अपनी बेटियों को बड़ा कर लूं। इसी प्रयास में पिछले 11 साल से लगी हूं।

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जुई करकरे।



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