शवों की शिनाख्त मुश्किल थी, घड़ी से और मोबाइल पर घंटी देकर बेटियों की पहचान की

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सूरत. सरथाणा जकातनाका के तक्षशिला आर्केड में लगी आग में आर्ट-हॉबीज क्लासेज के छात्र-छात्राओं समेत 21 की मौत हो गई। इनमें से 16 की मौत जलकर और तीन की मौत चौथी मंजिल से कूदने से हुई। परिजनको अपने मृतक बच्चों की पहचान करना मुश्किल हो गया। उन्होंने घड़ी और मोबाइल पर घंटी देकर शिनाख्त की।कई तो घंटों तक भटकते रहे।

18 साल की जाह्नवी चतुरभाई वसोया और 17 साल की कृति नीलेश दयाल की पहचान उनकी घड़ियों से हुई। इनके परिजन ने बताया कि दोनों इंस्टीट्यूट में पढ़ने आती थीं। कुछ दिन पहले इन्हेंघड़ी दिलाई थी। कुछपरिजनबच्चों कोढूंढते हुए स्मीमेर अस्पताल पहुंचे। इसी तरह 18 साल की एशा खड़ेलाड्रॉइंग सीखने जाती थी। पिता ने एशा के मोबाइल पर फोन किया, तो घंटी मोर्चरी में रखे शव से चिपके मोबाइल पर बजी। वहीं, मौजूद एक कर्मचारी ने फोन उठाया और पिता को पूरी घटना बताई। एशा पूरी तरह जल चुकी थी, लेकिन संयोग से फोन बच गया था।

प्लास्टिक के बोरो में लाई गई लाशें

  • स्मीमेर अस्पताल एक के बाद एक करीब 10 एम्बुलेंस में 17 शव 30 मिनट में पहुंचाए गए। शव चादर और प्लास्टिक के बोरों में लाए गए। उधर, पीड़ित बच्चों के परिजन का अस्पताल पहुंचना शुरू हो गया था।
  • शव तो उनके सामने थे, लेकिन उन्हें पहचानना मुश्किल था। उनकी पहचान के लिए कोई पासपोर्ट फोटो तो कोई मोबाइल में फोटो लेकर आया था। बेहाल होकर वे अपने लापता परिजन और बच्चों की फोटो सभी को बताकर पहचान की कोशिश करते देखे गए।

हादसे के वक्त 60 बच्चे अलग-अलग क्लासेज में मौजूद थे
घटना के समय 15 से 22 की उम्र के 60 छात्र-छात्राएं दूसरी और तीसरी मंजिल पर चलने वाली दो आर्ट-हॉबीज क्लासेज अटेंड कर रहे थे। देर रात तक 21 शवों की शिनाख्त हो पाई। हादसा गुरुवार दोपहर 3:40 बजे हुआ। शाम को करीब 7:30 बजे तक आग बुझ पाई।

मरना तो तय था मैंने सोचा कूद गया तो बच जाऊंगा

  • 15 साल के राम वाघाणी ने बताया, “मैं अलोहा के नाम से चल रहे माइंड फ्रेश यानी कि मेंटली डेवलप क्लासेस में था तभी धुआं चारों ओर फैलने लगा। मैडम जेनीशाबेन के साथ मैं भी तीसरी मंजिल पर गया। हमारे पास तीसरी मंजिल से कूदने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं था। अब तो मरना ही है, यह सोचकर कूद गया। शुक्र है बच गया।”
  • लोग फोटो लेने और वीडियो बना रहे थे तभी केतन दूसरी मंजिल तक पहुंच गया और नीचे उतरने की कोशिश कर रहे दो बच्चों को आग से बचा लिया।
  • हॉस्पिटल में भर्ती रेंसी ने बताया, “घटना के समय वे क्रिएटर इंस्टीट्यूट में क्लास में थीं। क्लास में 22 लोग थे। दो-तीन छोटे बच्चे भी थे। कॉम्प्लैक्स में एंट्री-एग्जिट एक ही है। इसलिए धुएं और लपटों से सांस लेना भी मुश्किल हो गया था। हमारी इंस्टीट्यूट के इंस्ट्रक्टर बचने के लिए खुद ही कूद गए थे। हमने सोचा कि अंदर रहे तो जलकर मरेंगे, कूदे तो हाथ-पैर ही टूटेंगे शायद जान बच जाए।”

39 साल पहले शांतिनाथ मिल में 98 की मौत हुई थी: 39 साल पहले शांतिनाथ मिल दुर्घटना में भीषण आग लगी थी। इस हादसे में 98 लोगों की मौत हो गई थी और 105 लोग जख्मी हो गए थे। दमकल विभाग के 200 कर्मचारियों को आग को बुझाने में पांच दिन लगे थे।

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जब शवों को लेकर स्मीमेर पहुंचे तो एक के पीछे एक शवों को लिए स्ट्रेचर की कतार लग गई


शवों को पहचानना तक मुश्किल था। न शरीर पर कोई कपड़ा बचा और न त्वचा। केवल हड्डियों का ढांचा बचा। घड़ी, मोबाइल और चेन से पहचाना गया।


families identified dead bodies by watching clock and mobile


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