सेना और ISI के जाल में फंसे इमरान भारत से दोस्ती का 'टेस्ट' कैसे जीतेंगे?

0
6




एक वक्त था जब पाकिस्तान की पूर्व पीएम बेनजीर भुट्टो ने पाक अधिकृत कश्मीर में कहा था कि वो कश्मीर के लिए भारत के साथ हजार साल तक जंग लड़ेंगीं. बेनजीर भुट्टो ने अपने पिता जुल्फिकार अली भुट्टो की कश्मीर पर सोच की तहरीरों को ही नुमाया किया था. जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी पाकिस्तान के वजीरे आजम रहते वक्त भारत के साथ हजार साल तक जंग लड़ने की बात की थी. ये और बात है कि बाद में उन्हें उस शख्स ने ही फांसी पर चढ़ा दिया जिसे उन्होंने खुद ही जनरल के लिए चुना था.

लेकिन पाकिस्तान की सियासी टीम के नए कैप्टन वजीरे आजम इमरान खान की सोच और अल्फाज तो पुराने नेताओं के बरक्स कहीं से दिखाई नहीं देती है. इमरान खान कहते हैं कि जब फ्रांस और जर्मनी एक हो सकते हैं तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान क्यों नहीं साथ आ सकते हैं? बहुत मुमकिन है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों के इतिहास को देखते हुए इमरान की अप्रोच को आज राजनीति के जानकार अव्यवहारिक और अपरिपक्व बताएं.

दरअसल, पाकिस्तान के जनरल और राष्ट्रपति रह चुके परवेज मुशर्रफ भी भारत के साथ करगिल से पहले ही कश्मीर पर जंग कर चुके होते अगर बेनजीर भुट्टो ने उन्हें रोका न होता. आखिर उनकी ख्वाहिश करगिल जंग के जरिए पूरी हुई जिसने उन्हें बाद में पाक का हुक्मरान बना दिया. करगिल जंग के बाद परवेज मुशर्रफ ने भी जिया उल हक की तरह ही तख्तापलट कर पाकिस्तान की चली आ रही रस्मों को निभाया और वजीरे आजम नवाज़ शरीफ को सलाखों के पीछे धकेल दिया.

[blurb]आज भी परवेज मुशर्रफ कश्मीर के मसले पर अपनी जुबान में लगे सियासत के जहर को मिटा नहीं सके हैं. कश्मीर के मुद्दे को हवा देने वाले परवेज मुशर्रफ आतंकियों को आजादी के लड़ाके बताते हैं.[/blurb]

भारत से जंग चाहने और करने का ऐलान करने वाले पाकिस्तानी हुक्मरान आतंकी हमलों को लेकर भी नावाकिफ नहीं रहे हैं. एक किताब में ये दावा किया गया था कि नब्बे के दशक के शुरुआती समय में पाकिस्तान के पीएम रहे नवाज़ शरीफ को भी मुंबई बम कांड की जानकारी थी. पूर्व भारतीय डिप्लोमैट राजीव डोगरा की एक किताब ‘व्हेयर बॉर्डर्स ब्लीड: एन इनसाइडर्स अकाउंट ऑफ इंडो-पाक रिलेशन्स’ में ये दावा किया गया है कि साल 1993 में मुंबई में हुए धमाकों की साजिश की जानकारी तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ को भी थी. राजीव डोगरा साल 1992 से 1994 तक करांची में भारतीय दूतावास में थे.

15 अप्रैल, 2005 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का नई दिल्ली में स्वागत करते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी. (रॉयटर्स).

दरअसल मजहबी कट्टरपंथ की आड़ में पाकिस्तान के नेता भारत के खिलाफ जहर उगलते आए हैं. उन्हें लगता था कि सिर्फ इसी सोच और तरीके के बूते ही पाकिस्तान की अवाम को बरगला कर चुनाव जीता जा सकता है. लेकिन वक्त का इंसाफ देखिए कि हिंदुस्तान से हजार साल तक जंग की बात करने वाले आज मौजूद नहीं तो पाकिस्तान की हुकूमत में बैठकर हुंकार भरने वालों के खिलाफ आज पाकिस्तान में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज है तो कोई करप्शन के आरोपों की वजह से जेल में है.

[blurb]भले ही पाकिस्तान के राजनीतिक हालात को देखते हुए इमरान के बयानों को मुफीद नहीं माना जाए लेकिन इमरान ने एक नई राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत कर दी है. उन्होंने ठीक उसी तरह से भारत के साथ रिश्तों की पहल को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया है जैसा एनडीए शासन के वक्त वाजपेयी जी के दौर में शुरू हुआ था.[/blurb]

करतारपुर कोरिडोर की आधारशिला रखने को इमरान खान ‘गुगली’ नहीं मानते हैं जैसा कि उनके एक वजीर ने कहा था. इमरान खान ये कह रहे हैं कि कश्मीर के मसले पर भारत और पाकिस्तान के बीच अब जंग नहीं हो सकती. इसके पीछे न सिर्फ शांति का पैगाम है बल्कि वो ये भी सच बयां कर रहे हैं कि दोनों देशों के परमाणु संपन्न होने की वजह से ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

ये पाकिस्तान की नई दौर की सियासत की शुरुआत मानी जा सकती है. कहां तो पाकिस्तान के हुक्मरान हिंदुस्तान के साथ हजार साल जंग की हसरत पाला करते थे लेकिन कभी जेल में तो कभी निर्वासन में तो कभी फांसी की वजह से उनकी सियासी ख्वाहिशें दम तोड़ गईं. वहीं इमरान यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ विवादास्पद मुद्दों पर भी व्यवहारिक सोच दिखाने की कोशिश कर रहे हैं जो कि काबिले तारीफ मानी जा सकती है.

[blurb]हालांकि भारत इतनी जल्दी पाकिस्तान की ‘मीठी गज़ल’ का मुरीद नहीं होने जा रहा है. दरअसल पाकिस्तान पर भरोसा न करने के पीछे ‘दगाबाजी के खंजर’ का वो काला इतिहास है जो कभी ‘65, कभी ‘71 तो कभी करगिल की जंग की शक्ल में मिला. पाकिस्तान की फितरत पर यकीन न करने के पीछे भारत के पास कई ठोस वजहें सबूतों के साथ हैं.[/blurb]

ऐसे में एक सवाल ये भी उठता है कि आखिर पाकिस्तान में बदले-बदले से सरकार क्यों हैं?

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान डायरी: मुल्क में हाहाकार, चौतरफा दबाव में इमरान सरकार

दरअसल पाकिस्तान की बदलती जुबान के पीछे असली वजह वो अमेरिका है जिसने पाकिस्तान की सियासत के बोल ही बदल दिए. आज पाकिस्तान की हुकूमत ही नहीं बल्कि सेना और आईएसआई भी अमेरिकी दबाव में है. दुनियाभर में पाकिस्तान की छवि आतंकियों की पनाहगाह और आतंकी संगठनों की नर्सरी के तौर पर कुख्यात हो चुकी है.

आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के साथ लड़ाई में साथ देने का वादा करने वाला पाकिस्तान अपनी ही जमीन पर अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादने को पनाह देने की वजह से बेनकाब हो चुका है.

आज भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग कर दिया है. अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली खरबों रुपये की आर्थिक मदद को रोक दिया है. अमेरिका की ग्लोबल टेररिस्ट लिस्ट के आतंकी पाकिस्तान में मौजूद हैं तो हाफिज सईद जैसे आतंकी ने चुनाव में अपनी पार्टी तक उतार दी.

एक तरफ पाकिस्तान आतंक के चस्पा दाग से बेहाल है तो दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर न मिलने की वजह से तंगहाली के बदतर दौर से गुजर रहा है.

बीजिंग में चीन के प्रधानमंत्री ली किगियांग के साथ इमरान खान (फोटो: रॉयटर्स)

पाकिस्तान कर्ज में गले-गले तक डूबा हुआ है. अपनी चुनावी रैलियों में इमरान खान बड़े फख्र से कहते आए थे कि वो दुनिया के सामने पाकिस्तान का कटोरा लेकर नहीं जाएंगे. लेकिन चुनाव बाद जब उन्हें मुल्क की आर्थिक स्थिति की हकीकत पता चली तो उन्होंने भी खाड़ी देशों से आर्थिक मदद मांगने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई.

अमेरिका से ठुकराए जाने के बाद आज पाकिस्तान कर्ज के लिए चीन का मोहताज हो चुका है तो एशिया में चीन का मोहरा भी बन चुका है. लेकिन पाकिस्तान भीतर ही भीतर ये भी जानता है कि सिर्फ चीन से दोस्ती के दम पर ज्यादा दूर तक नहीं चला जा सकता है.

[blurb]पाकिस्तान को पुराना अमेरिका बार-बार और बहुत याद आता है. ऐसे में पाकिस्तान अपने नए निजाम के जरिए आतंकवाद का चस्पा दाग मिटाने की कोशिश कर रहा है. इमरान खान की सरकार पर न तो 9-11 हमले की कभी आंच लगी है और न ही मुंबई के 26-11 हमले का साया है.[/blurb]

एक तरह से करप्शन और आतंकवाद के मसले पर इमरान खान की सरकार एकदम साफ सुथरी है. यही वजह है कि इमरान की साफ छवि के जरिए पाकिस्तान की सेना और आईएसआई छवि सुधार की कोशिश में जुटी हुई है ताकि पाकिस्तान के पुराने दिन लौट सके.

चूंकि भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर ही सबसे विवादास्पद और फसाद का मुद्दा है. तभी इमरान को उदारवादी दिखाते हुए जहां एक तरफ करतारपुर कोरिडोर की आधारशिला रखी गई तो दूसरी तरफ कश्मीर के मसले पर इमरान जंग से हटकर बयान दे रहे हैं. जाहिर तौर पर इससे एक परमाणु संपन्न देश के वजीरे आजम की जिम्मेदार छवि ही दुनिया के सामने आती है.

[blurb]दरअसल, ग्लोबल दुनिया अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां जंग की बात करने वाला मुल्क शैतान और शांति की बात करने वाला मुल्क मसीहा माना जाने लगा है. आज अमेरिका सुपरपावर होते हुए भी नॉर्थ कोरिया पर परमाणु हमले ही हजारों धमकियों के बावजूद आक्रमण का साहस नहीं जुटा सका.[/blurb]

अमेरिका ने वीटो पावर होते हुए भी नॉर्थ कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग के साथ परमाणु टेबल से उठकर बातचीत की टेबल पर बैठना जरूरी समझा. दुनिया अमन चाहती है और अमेरिका जैसा देश भी युद्ध की धमकी देकर अब विलेन बनने की गलती नहीं करना चाहता.

ये भी पढ़ें: OPEC का सदस्य नहीं रहेगा कतर, ऊर्जा मंत्री बोले- गैस उत्पादन पर करेंगे फोकस

ऐसे में पाकिस्तान में लोकतांत्रिक हुकूमत का मुखौटा सामने रख कर पीछे से सरकार चलाने वाली सेना और आईएसआई भी इमरान खान के जरिए पाकिस्तान के आतंकी इतिहास पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है ताकि पाकिस्तान के पॉपुलर चेहरे से पाकिस्तान को भी पॉजिटिव तरीके से पॉपुलर किया जा सके.

विश्वनाथ सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने एक बार लोकसभा में कहा था कि जो लोग भारत से जंग लड़ने की बात करते हैं उनका एक हजार साल तक क्या अस्तित्व रहेगा? इमरान खान शायद हिंदुस्तान के पूर्व वजीरे आजम की बात की गहराई को समझ गए हैं तभी वो नए दौर की राजनीति कर 70 साल से दोनों मुल्कों के दरम्यान रिश्तों की बेड़ियों को तोड़ने की कोशिश करना चाहते हैं.

वो बार-बार ये भी दोहरा रहे हैं कि उनकी पार्टी और फौज साथ-साथ हैं. ताकि उनकी बातों को भारतीय सरकार गंभीरता से ले. शायद तभी उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री को सार्क देशों के सम्मेलन में आने का न्योता भी दिया है.

इमरान कह रहे हैं कि दुनिया चांद पर जा रही है और दोनों मुल्क वहीं के वहीं खड़े हुए हैं. इमरान चाहते हैं कि जो कुछ पहले हुआ सो हुआ, अब एक नई पहल की जरूरत है. लेकिन करतारपुर कोरिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में खालिस्तानी आतंकी को न्योता देकर वो भी भारत के जख्मों को हरा करने का की काम कर रहे हैं. ऐसे में एकबारगी चांद पर जाना आसान लगता है लेकिन पाकिस्तान की नीयत पर भरोसा करना बड़े दिल के हिंदुस्तान के लिए मुश्किल और नामुमकिन लगता है.



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here